लखनऊ में नवाबों की जब नवाबी खत्म हुई फिर शुरू हुआ उनके कीमती सामानों के लूटने और खरीदने बेचने का कारोबार

दोस्तों आरडी शुक्ला आपको वह कहानी सुना रहा है जो आप जानते भी नहीं होंगे कि लखनऊ में हुआ क्या मैं बता रहा हूं जब नवाबों की नवाबी सन 1960 के बाद खत्म होना शुरू हुई और वही लोग पैदल होना शुरू हुए उनकी मौज मस्ती खत्म होना शुरू हुई उनकी दौलत खत्म होना शुरू हुई प्रदेश में लोकतांत्रिक माहौल बनना शुरू हुआ नेतागिरी शुरू हुई तो नवाबों का बैंड बजने लगा नवाब करते क्या काम कर नहीं सकते थे बिजनेस कर नहीं सकते थे नेतागिरी में उनका कोई रोल नहीं था उन्होंने अपनी कीमती संपत्ति बेचना शुरू किया बस यहीं से शुरू हुआ लखनऊ में खून खराबे का दौर यह बहुत खतरनाक समय था कुछ अपराधियों ने नवाबों का सामान खरीदना बेचना शुरू किया इसी में तमाम हत्याएं हुई लखनऊ इससे पहले शांत रहता था लेकिन नवाबों के कीमती सामानों ने एंटीक्स ने लखनऊ में बवाल शुरू कर दिया खास तौर पर चौक क्षेत्र में जहां नखास की बाजार लगती है वहां इसका खेल शुरू हुआ वहां दो गिरोह बने एक था शब्बीर का और सदन लाल का इन दोनों गिरोहों में नवाबों के समान को बेचने के संबंध में टकराव शुरू हो गया सस्ते और टके के दाम पर नवाबों के कीमती सामान यज्ञ रो खरीदा था और उनको महंगे दामों पर बाहर बेचता था उस समय नवाबों के पास वह वो कीमती सामान वह वह कीमती फर्नीचर मौजूद था जिसकी कीमत इतनी होती थी कि सोची भी नहीं जा सकती थी सोना चांदी हीरा मोती जितना नवाब कोठों पर लुटा नहीं पाए थे मौज मस्ती में खर्च नहीं कर पाए थे वह सब बेचने लगे जमीन जा जात कोठी सब उनकी बिकने लगी और यह अपराधी उस में हिस्सेदारी करने लगे इसी चक्कर में चौक क्षेत्र में कई कत्ल हो गए सबसे खूंखार एरिया चौक हो गया सबसे कीमती एरिया बन गया और वहां बहुत कुछ खून खराब होने लगे कहने को नवाबों के ये अंत का समय था और वहीं से शुरू हो गया नवाबों के पतन का समय बस यही से नवाबों का दौर खत्म होने लगा नया लखनऊ बसने लगा पुराना लखनऊ पुराना होने लगा लेकिन जब तक नवाबों का 11 सामान बिक नहीं गया तब तक सारी बदमाशी चौक क्षेत्र या पुराने लखनऊ में होती रही उसके बाद सारा खेल नए लखनऊ की ओर शुरू हुआ और नवाबों की नवाबी सवार हो गई नए लखनऊ में आगे कहानी जारी रहेगी आरडी आपको लखनऊ की पुरानी दास्तान सुनाता रहेगा चाहे वह बदमाशी हो या यहां की मौज मस्ती


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